Tribal Rebellions in Jharkhand
झारखण्ड में जनजातीय विद्रोह
झारखण्ड में जनजातीय विद्रोह - परिचय
झारखण्ड का इतिहास जनजातीय अस्मिता, स्वाभिमान तथा संघर्ष की गौरवशाली परम्परा से परिपूर्ण है। अंग्रेजों के आगमन के पश्चात् इस क्षेत्र की पारंपरिक सामाजिक, आर्थिक एवं प्रशासनिक व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन हुए। नई भू-राजस्व व्यवस्था, जंगलों पर नियंत्रण, स्थानीय शासकों के अधिकारों में हस्तक्षेप तथा महाजनी शोषण के कारण विभिन्न जनजातियों ने समय-समय पर अंग्रेजी शासन के विरुद्ध अनेक विद्रोह किए।
इन जनजातीय आंदोलनों का उद्देश्य केवल अंग्रेजों का विरोध करना नहीं था, बल्कि अपनी भूमि, जल, जंगल, संस्कृति, परम्पराओं तथा स्वशासन की रक्षा करना भी था। यही कारण है कि झारखण्ड के जनजातीय विद्रोह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रारम्भिक चरण के महत्वपूर्ण अध्याय माने जाते हैं।
परीक्षा दृष्टि से महत्वपूर्ण
- झारखण्ड को जनजातीय आंदोलनों की भूमि भी कहा जाता है।
- 1767 ई. से लेकर 20वीं शताब्दी के प्रारम्भ तक अनेक महत्वपूर्ण जनजातीय विद्रोह हुए।
- JSSC एवं JPSC परीक्षाओं में लगभग प्रत्येक परीक्षा में इस अध्याय से प्रश्न पूछे जाते हैं।
जनजातीय विद्रोहों के प्रमुख कारण
झारखण्ड में हुए अधिकांश जनजातीय विद्रोहों के पीछे कई सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक तथा राजनीतिक कारण थे। अंग्रेजों की नई नीतियों ने पारंपरिक जनजातीय जीवन को प्रभावित किया, जिसके परिणामस्वरूप व्यापक असंतोष उत्पन्न हुआ।
| कारण |
विवरण |
| भूमि पर अधिकार |
जनजातियों की परम्परागत भूमि पर जमींदारों एवं अंग्रेजों का नियंत्रण स्थापित होना। |
| भू-राजस्व नीति |
नए कर एवं लगान के कारण किसानों एवं जनजातियों पर आर्थिक बोझ बढ़ा। |
| महाजनी शोषण |
सूदखोर महाजनों एवं साहूकारों द्वारा आर्थिक शोषण। |
| वन कानून |
जंगलों पर सरकारी नियंत्रण स्थापित होने से पारंपरिक अधिकार सीमित हुए। |
| स्थानीय शासन में हस्तक्षेप |
राजाओं, मुखियाओं एवं मानकी-मुंडाओं के अधिकार कम किए गए। |
| सामाजिक एवं सांस्कृतिक हस्तक्षेप |
जनजातीय परम्पराओं एवं जीवन शैली पर बाहरी प्रभाव बढ़ा। |
झारखण्ड के प्रमुख जनजातीय विद्रोह (कालक्रम)
| वर्ष |
विद्रोह |
| 1767–1777 |
ढाल विद्रोह |
| 1769–1805 |
चुआड़ विद्रोह |
| 1770–1771 |
चेरो विद्रोह |
| 1770–1771 |
भोगता आंदोलन |
| 1772–1773 |
घटवाल विद्रोह |
| 1772–1782 |
पहाड़िया प्रतिरोध |
| 1782–1821 |
तमाड़ आंदोलन |
| 1784–1785 |
तिलका मांझी आंदोलन |
| 1831–32 |
कोल विद्रोह |
| 1832–33 |
भूमिज विद्रोह |
| 1820–21 |
हो विद्रोह |
| 1855–56 |
संथाल हूल/संथाल विद्रोह |
| 1858–1895 |
सरदारी आंदोलन |
| 1870 |
साफाहोड़ आंदोलन |
| 1874 |
खरवार आंदोलन |
| 1895–1900 |
बिरसा आंदोलन (उलगुलान) |
| 1914 |
टाना भगत आंदोलन |
झारखण्ड में जनजातीय विद्रोह - परिचय
झारखण्ड का इतिहास जनजातीय अस्मिता, स्वाभिमान तथा संघर्ष की गौरवशाली परम्परा से परिपूर्ण है। अंग्रेजों के आगमन के पश्चात् इस क्षेत्र की पारंपरिक सामाजिक, आर्थिक एवं प्रशासनिक व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन हुए। नई भू-राजस्व व्यवस्था, जंगलों पर नियंत्रण, स्थानीय शासकों के अधिकारों में हस्तक्षेप तथा महाजनी शोषण के कारण विभिन्न जनजातियों ने समय-समय पर अंग्रेजी शासन के विरुद्ध अनेक विद्रोह किए।
इन जनजातीय आंदोलनों का उद्देश्य केवल अंग्रेजों का विरोध करना नहीं था, बल्कि अपनी भूमि, जल, जंगल, संस्कृति, परम्पराओं तथा स्वशासन की रक्षा करना भी था। यही कारण है कि झारखण्ड के जनजातीय विद्रोह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रारम्भिक चरण के महत्वपूर्ण अध्याय माने जाते हैं।
परीक्षा दृष्टि से महत्वपूर्ण
- झारखण्ड को जनजातीय आंदोलनों की भूमि भी कहा जाता है।
- 1767 ई. से लेकर 20वीं शताब्दी के प्रारम्भ तक अनेक महत्वपूर्ण जनजातीय विद्रोह हुए।
- JSSC एवं JPSC परीक्षाओं में लगभग प्रत्येक परीक्षा में इस अध्याय से प्रश्न पूछे जाते हैं।
जनजातीय विद्रोहों के प्रमुख कारण
झारखण्ड में हुए अधिकांश जनजातीय विद्रोहों के पीछे कई सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक तथा राजनीतिक कारण थे। अंग्रेजों की नई नीतियों ने पारंपरिक जनजातीय जीवन को प्रभावित किया, जिसके परिणामस्वरूप व्यापक असंतोष उत्पन्न हुआ।
| कारण |
विवरण |
| भूमि पर अधिकार |
जनजातियों की परम्परागत भूमि पर जमींदारों एवं अंग्रेजों का नियंत्रण स्थापित होना। |
| भू-राजस्व नीति |
नए कर एवं लगान के कारण किसानों एवं जनजातियों पर आर्थिक बोझ बढ़ा। |
| महाजनी शोषण |
सूदखोर महाजनों एवं साहूकारों द्वारा आर्थिक शोषण। |
| वन कानून |
जंगलों पर सरकारी नियंत्रण स्थापित होने से पारंपरिक अधिकार सीमित हुए। |
| स्थानीय शासन में हस्तक्षेप |
राजाओं, मुखियाओं एवं मानकी-मुंडाओं के अधिकार कम किए गए। |
| सामाजिक एवं सांस्कृतिक हस्तक्षेप |
जनजातीय परम्पराओं एवं जीवन शैली पर बाहरी प्रभाव बढ़ा। |
झारखण्ड के प्रमुख जनजातीय विद्रोह (कालक्रम)
| वर्ष |
विद्रोह |
| 1767–1777 |
ढाल विद्रोह |
| 1769–1805 |
चुआड़ विद्रोह |
| 1770–1771 |
चेरो विद्रोह |
| 1770–1771 |
भोगता आंदोलन |
| 1772–1773 |
घटवाल विद्रोह |
| 1772–1782 |
पहाड़िया प्रतिरोध |
| 1782–1821 |
तमाड़ आंदोलन |
| 1784–1785 |
तिलका मांझी आंदोलन |
| 1831–32 |
कोल विद्रोह |
| 1832–33 |
भूमिज विद्रोह |
| 1820–21 |
हो विद्रोह |
| 1855–56 |
संथाल हूल/संथाल विद्रोह |
| 1858–1895 |
सरदारी आंदोलन |
| 1870 |
साफाहोड़ आंदोलन |
| 1874 |
खरवार आंदोलन |
| 1895–1900 |
बिरसा आंदोलन (उलगुलान) |
| 1914 |
टाना भगत आंदोलन |