Tribal Rebellions in Jharkhand
झारखण्ड में जनजातीय विद्रोह
ताना भगत आंदोलन (1914)
ताना भगत आंदोलन झारखण्ड के उराँव समुदाय द्वारा संचालित एक महत्वपूर्ण सामाजिक, धार्मिक एवं राजनीतिक आंदोलन था। इसकी शुरुआत
21 अप्रैल, 1914 को जतरा भगत के नेतृत्व में वर्तमान गुमला क्षेत्र से हुई। प्रारम्भ में इसका उद्देश्य सामाजिक एवं धार्मिक सुधार था, लेकिन आगे चलकर यह ब्रिटिश शासन एवं शोषण के विरुद्ध अहिंसक जनआंदोलन बन गया।
परीक्षा दृष्टि से महत्वपूर्ण
- प्रारम्भ : 21 अप्रैल, 1914
- प्रमुख नेता : जतरा भगत
- मुख्य क्षेत्र : गुमला एवं छोटानागपुर
- समुदाय : उराँव (कुड़ुख) जनजाति
- स्वरूप : सामाजिक, धार्मिक एवं बाद में राजनीतिक आंदोलन
आंदोलन की पृष्ठभूमि
बिरसा आंदोलन के बाद भी आदिवासी समाज भूमि समस्या, करों, बेगार, सामाजिक कुरीतियों तथा औपनिवेशिक शोषण से जूझ रहा था। इसी परिस्थिति में उराँव समाज के भीतर आत्म-सुधार तथा स्वशासन की भावना विकसित हुई, जिसने ताना भगत आंदोलन का आधार तैयार किया।
प्रमुख उद्देश्य
- आदिवासी समाज में सामाजिक एवं धार्मिक सुधार लाना।
- एकेश्वरवाद तथा नैतिक जीवन का प्रचार करना।
- मांस, मदिरा एवं नशे का त्याग करना।
- झूम खेती की अपेक्षा व्यवस्थित कृषि को बढ़ावा देना।
- आदिवासी समाज में अनुशासन, स्वच्छता एवं समानता स्थापित करना।
- अंततः स्वशासन एवं अन्यायपूर्ण शासन का विरोध करना।
आंदोलन की प्रमुख विशेषताएँ
- यह आंदोलन प्रारम्भ में कुड़ुख धर्म आंदोलन के रूप में भी जाना गया।
- इसका संबंध मुख्यतः उराँव (कुड़ुख) जनजाति से था।
- जतरा भगत ने लोगों को एकेश्वरवाद, सादा जीवन एवं नैतिक आचरण अपनाने का संदेश दिया।
- उन्होंने मांस, मदिरा तथा अन्य नशीले पदार्थों के सेवन का विरोध किया।
- इस आंदोलन का मूल उद्देश्य समाज में आत्म-सुधार के माध्यम से नई चेतना का विकास करना था।
प्रसार में योगदान
ताना भगत आंदोलन के विस्तार में विभिन्न क्षेत्रों के अनेक स्थानीय नेताओं एवं अनुयायियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- मांडर – शिबू भगत
- घाघरा – बलराम भगत
- विशुनपुर – भिखू भगत
- सिसई – देवमनिया (महिला कार्यकर्ता)
जतरा भगत की गिरफ्तारी
ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए 1916 में जतरा भगत को गिरफ्तार कर एक वर्ष का कारावास दिया। बाद में उन्हें शांति बनाए रखने की शर्त पर रिहा किया गया, किंतु रिहाई के लगभग दो माह बाद ही उनका निधन हो गया। अनेक इतिहासकार उनकी मृत्यु का कारण जेल में मिली प्रताड़ना को मानते हैं।
महत्वपूर्ण तथ्य
- ताना भगत आंदोलन की शुरुआत 21 अप्रैल, 1914 को हुई।
- इस आंदोलन का नेतृत्व जतरा भगत ने किया।
- इसे बिरसा आंदोलन का वैचारिक विस्तार माना जाता है।
- प्रारम्भिक स्वरूप सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आंदोलन का था।
- मुख्य उद्देश्य स्वशासन, सामाजिक सुधार तथा नैतिक जीवन की स्थापना था।
- इस आंदोलन का प्रारम्भिक नाम कुड़ुख धर्म आंदोलन भी माना जाता है।
- 1916 में जतरा भगत को ब्रिटिश सरकार ने गिरफ्तार किया था।
ताना भगत आंदोलन (1914)
आंदोलन का विस्तार एवं विकास
जतरा भगत की गिरफ्तारी के बाद भी आंदोलन समाप्त नहीं हुआ। उनके अनुयायियों ने इसे आगे बढ़ाया और धीरे-धीरे इसका प्रभाव राँची, पलामू, गुमला, लोहरदगा तथा सरगुजा क्षेत्र तक फैल गया। प्रारम्भ में यह धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आंदोलन था, परन्तु समय के साथ इसका स्वरूप राजनीतिक एवं ब्रिटिश-विरोधी आंदोलन में परिवर्तित हो गया।
1916 के अंत तक आंदोलन छोटानागपुर के अनेक क्षेत्रों में फैल चुका था। ताना भगतों ने स्थानीय शासकों एवं अंग्रेजी प्रशासन के समक्ष भूमि कर समाप्त करने, स्वशासन की स्थापना तथा सामाजिक समानता की माँग रखी।
आंतरिक परिवर्तन
मांडर क्षेत्र में शिबू भगत द्वारा कुछ अनुयायियों को मांसाहार की अनुमति देने के कारण आंदोलन के भीतर मतभेद उत्पन्न हो गए। परिणामस्वरूप ताना भगत दो प्रमुख वर्गों में विभाजित हो गए।
- जुलाहा भगत — मांसाहार स्वीकार करने वाले अनुयायी।
- अरवा भगत — पूर्णतः शाकाहारी एवं मूल सिद्धांतों का पालन करने वाले अनुयायी।
राजनीतिक स्वरूप
समय के साथ ताना भगत आंदोलन केवल धार्मिक सुधार तक सीमित नहीं रहा। इसने अंग्रेजी शासन, अन्यायपूर्ण कर व्यवस्था तथा सामंती शोषण के विरुद्ध संगठित एवं अहिंसक संघर्ष का रूप धारण कर लिया।
ताना भगतों ने पलामू के राजा के समक्ष स्वशासन स्थापित करने, भूमि कर समाप्त करने तथा सामाजिक समानता लागू करने की माँग रखी। इन मांगों को अस्वीकार किए जाने के बाद आंदोलन और अधिक व्यापक हो गया।
1919 का चरण
1919 में छोटानागपुर क्षेत्र में ताना भगत आंदोलन से जुड़े अनेक नेताओं को गिरफ्तार किया गया, जिनमें प्रमुख थे—
- शिबू भगत
- देवीया भगत
- सिंह भगत
- माया भगत
- सुक्रा भगत
गिरफ्तारियों के बावजूद आंदोलन जारी रहा और ग्रामीण क्षेत्रों में इसका प्रभाव लगातार बढ़ता गया।
मालगुजारी एवं चौकीदारी कर का विरोध
दिसम्बर 1919 में तुरिया भगत एवं जीतू भगत ने लोगों से चौकीदारी कर तथा जमींदारों को मालगुजारी न देने का आह्वान किया। इससे आंदोलन का आर्थिक पक्ष भी मजबूत हुआ और यह औपनिवेशिक कर व्यवस्था के विरोध का प्रतीक बन गया।
अहिंसा का सिद्धांत
ताना भगत आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसका पूर्णतः अहिंसक स्वरूप था। आंदोलनकारियों ने सत्य, अनुशासन, संयम एवं शांतिपूर्ण विरोध को अपने संघर्ष का आधार बनाया। यही विशेषता आगे चलकर महात्मा गांधी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय आंदोलनों से इसके जुड़ने का प्रमुख कारण बनी।
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
- 1916 तक आंदोलन राँची, पलामू एवं सरगुजा क्षेत्र तक फैल गया था।
- शिबू भगत द्वारा मांसाहार स्वीकार करने पर आंदोलन दो भागों—जुलाहा भगत एवं अरवा भगत—में विभाजित हुआ।
- 1919 में अनेक प्रमुख ताना भगत नेताओं को गिरफ्तार किया गया।
- ताना भगतों ने भूमि कर एवं चौकीदारी कर का विरोध किया।
- यह झारखण्ड का प्रमुख अहिंसक आदिवासी आंदोलन माना जाता है।
ताना भगत आंदोलन (1914)
महात्मा गांधी एवं राष्ट्रीय आंदोलन से संबंध
ताना भगत आंदोलन अपने प्रारम्भिक चरण में धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आंदोलन था, लेकिन आगे चलकर यह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गया। इसके अनुयायियों ने महात्मा गांधी के सत्य, अहिंसा एवं असहयोग के सिद्धांतों को अपनाया और राष्ट्रीय आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी निभाई।
सविनय अवज्ञा आंदोलन तथा असहयोग आंदोलन के दौरान ताना भगतों ने शराब की दुकानों पर धरना, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार तथा शांतिपूर्ण सत्याग्रह जैसे कार्यक्रमों में भाग लिया। वे खादी पहनने, चरखा चलाने और स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग पर विशेष बल देते थे।
महात्मा गांधी से संबंध
- ताना भगत महात्मा गांधी के सिद्धांतों से अत्यधिक प्रभावित थे।
- उन्होंने खादी धारण करना एवं चरखा चलाना अपनाया।
- 1921 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में ताना भगतों ने सिद्धू भगत के नेतृत्व में भाग लिया।
- 1922 के गया कांग्रेस अधिवेशन तथा 1923 के नागपुर कांग्रेस अधिवेशन में भी ताना भगतों की भागीदारी रही।
- 1940 में रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन के दौरान ताना भगतों ने महात्मा गांधी को ₹400 की सहयोग राशि भेंट की।
आंदोलन की विशेषताएँ
- यह झारखण्ड का पहला प्रमुख अहिंसक आदिवासी आंदोलन माना जाता है।
- आंदोलन का आधार सत्य, अहिंसा, अनुशासन एवं सामाजिक समानता था।
- इसने धार्मिक सुधार से आगे बढ़कर राजनीतिक चेतना का विकास किया।
- आंदोलन ने आदिवासी समाज को राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
ऐतिहासिक महत्व
ताना भगत आंदोलन ने झारखण्ड के आदिवासी समाज में सामाजिक जागरूकता, नैतिक अनुशासन एवं राष्ट्रीय चेतना का विकास किया। यह आंदोलन ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अहिंसक संघर्ष का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। इसके माध्यम से आदिवासी समाज पहली बार बड़े स्तर पर भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ा और स्वतंत्रता संग्राम में अपनी सक्रिय भागीदारी दर्ज कराई।
Exam Booster (JSSC/JPSC)
- प्रारम्भ — 21 अप्रैल, 1914
- संस्थापक — जतरा भगत
- जनजाति — उराँव (कुड़ुख)
- प्रारम्भिक नाम — कुड़ुख धर्म आंदोलन
- मुख्य उद्देश्य — स्वशासन, सामाजिक सुधार एवं एकेश्वरवाद
- मुख्य विशेषता — झारखण्ड का प्रथम प्रमुख अहिंसक आदिवासी आंदोलन
- महात्मा गांधी के सिद्धांतों को अपनाने वाला प्रमुख आदिवासी आंदोलन।
- 1922 गया एवं 1923 नागपुर कांग्रेस अधिवेशन में भागीदारी।
- 1940 रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन में गांधीजी को ₹400 की भेंट।
- बिरसा आंदोलन के वैचारिक उत्तराधिकारी के रूप में माना जाता है।
एक नज़र में (Quick Revision)
| विषय |
तथ्य |
| वर्ष |
1914 |
| प्रमुख नेता |
जतरा भगत |
| मुख्य जनजाति |
उराँव (कुड़ुख) |
| स्वरूप |
धार्मिक → सामाजिक → राजनीतिक आंदोलन |
| मुख्य सिद्धांत |
सत्य, अहिंसा, एकेश्वरवाद, स्वशासन |
| गांधीजी से संबंध |
असहयोग, सविनय अवज्ञा, खादी एवं चरखा |
| विशेष पहचान |
झारखण्ड का प्रमुख अहिंसक आदिवासी आंदोलन |
MCQs – ताना भगत आंदोलन (1914)
1. ताना भगत आंदोलन का प्रारम्भ कब हुआ था?
- A. 1895 ई.
- B. 1908 ई.
- C. 21 अप्रैल, 1914
- D. 1920 ई.
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: C. 21 अप्रैल, 1914
व्याख्या: ताना भगत आंदोलन की शुरुआत 21 अप्रैल, 1914 को जतरा भगत के नेतृत्व में हुई थी।
2. ताना भगत आंदोलन के प्रवर्तक कौन थे?
- A. बिरसा मुंडा
- B. जतरा भगत
- C. सिद्धू मुर्मू
- D. लाल हेंब्रम
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: B. जतरा भगत
व्याख्या: ताना भगत आंदोलन का नेतृत्व उराँव जनजाति के जतरा भगत ने किया था।
3. ताना भगत आंदोलन मुख्यतः किस जनजाति से संबंधित था?
- A. मुंडा
- B. संथाल
- C. उराँव (कुड़ुख)
- D. हो
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: C. उराँव (कुड़ुख)
व्याख्या: यह आंदोलन मुख्य रूप से उराँव (कुड़ुख) जनजाति द्वारा संचालित किया गया था।
4. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए—
1. ताना भगत आंदोलन का प्रारम्भ धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आंदोलन के रूप में हुआ।
2. बाद में यह ब्रिटिश शासन के विरुद्ध राजनीतिक आंदोलन बन गया।
3. इसका प्रारम्भ संथाल परगना से हुआ था।
उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
- A. केवल 1 और 2
- B. केवल 2 और 3
- C. केवल 1 और 3
- D. 1, 2 और 3
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: A. केवल 1 और 2
व्याख्या: आंदोलन की शुरुआत गुमला क्षेत्र से हुई थी, संथाल परगना से नहीं।
5. ताना भगत आंदोलन का प्रारम्भिक नाम क्या था?
- A. बिरसाइट आंदोलन
- B. कुड़ुख धर्म आंदोलन
- C. मुल्की-मिल्की आंदोलन
- D. हूल आंदोलन
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: B. कुड़ुख धर्म आंदोलन
व्याख्या: प्रारम्भिक चरण में ताना भगत आंदोलन को कुड़ुख धर्म आंदोलन के नाम से भी जाना जाता था।
6. ताना भगत आंदोलन के संबंध में निम्नलिखित घटनाओं का सही कालानुक्रम क्या है?
- A. आंदोलन प्रारम्भ → जतरा भगत की गिरफ्तारी → असहयोग आंदोलन में भागीदारी → रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन
- B. जतरा भगत की गिरफ्तारी → आंदोलन प्रारम्भ → रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन → असहयोग आंदोलन
- C. असहयोग आंदोलन → आंदोलन प्रारम्भ → जतरा भगत की गिरफ्तारी → रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन
- D. आंदोलन प्रारम्भ → रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन → असहयोग आंदोलन → जतरा भगत की गिरफ्तारी
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: A. आंदोलन प्रारम्भ → जतरा भगत की गिरफ्तारी → असहयोग आंदोलन में भागीदारी → रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन
व्याख्या: 1914 → 1916 → 1920–22 → 1940 का क्रम सही है।
7. ताना भगत आंदोलन के अनुयायियों ने महात्मा गांधी से प्रेरित होकर क्या अपनाया?
- A. सशस्त्र संघर्ष
- B. विदेशी वस्तुओं का उपयोग
- C. खादी, चरखा एवं सत्याग्रह
- D. पृथक राज्य आंदोलन
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: C. खादी, चरखा एवं सत्याग्रह
व्याख्या: ताना भगतों ने महात्मा गांधी के सत्य, अहिंसा, स्वदेशी एवं खादी के सिद्धांतों को अपनाया।
8. कथन (A): ताना भगत आंदोलन झारखण्ड का प्रमुख अहिंसक आदिवासी आंदोलन था।
कारण (R): इसके अनुयायियों ने सत्य एवं अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए गांधीवादी विचारों को अपनाया।
- A. A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है।
- B. A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- C. A सही है, R गलत है।
- D. A गलत है, R सही है।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: A. A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है।
व्याख्या: ताना भगत आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता उसका पूर्णतः अहिंसक स्वरूप था।
9. 1940 के रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन में ताना भगतों ने महात्मा गांधी को कितनी राशि भेंट की थी?
- A. ₹100
- B. ₹250
- C. ₹400
- D. ₹500
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: C. ₹400
व्याख्या: 1940 के रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन में ताना भगतों ने महात्मा गांधी को ₹400 की सहयोग राशि भेंट की थी।
10. निम्नलिखित में से ताना भगत आंदोलन के संबंध में कौन-सा कथन सही है?
- A. यह केवल धार्मिक आंदोलन था।
- B. इसका नेतृत्व बिरसा मुंडा ने किया था।
- C. यह धार्मिक, सामाजिक एवं बाद में राजनीतिक आंदोलन के रूप में विकसित हुआ।
- D. इसका संबंध संथाल जनजाति से था।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: C. यह धार्मिक, सामाजिक एवं बाद में राजनीतिक आंदोलन के रूप में विकसित हुआ।
व्याख्या: ताना भगत आंदोलन की शुरुआत सामाजिक एवं धार्मिक सुधार से हुई, लेकिन आगे चलकर यह ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एक महत्वपूर्ण राजनीतिक एवं अहिंसक आंदोलन बन गया।
ताना भगत आंदोलन (1914)
ताना भगत आंदोलन झारखण्ड के उराँव समुदाय द्वारा संचालित एक महत्वपूर्ण सामाजिक, धार्मिक एवं राजनीतिक आंदोलन था। इसकी शुरुआत
21 अप्रैल, 1914 को जतरा भगत के नेतृत्व में वर्तमान गुमला क्षेत्र से हुई। प्रारम्भ में इसका उद्देश्य सामाजिक एवं धार्मिक सुधार था, लेकिन आगे चलकर यह ब्रिटिश शासन एवं शोषण के विरुद्ध अहिंसक जनआंदोलन बन गया।
परीक्षा दृष्टि से महत्वपूर्ण
- प्रारम्भ : 21 अप्रैल, 1914
- प्रमुख नेता : जतरा भगत
- मुख्य क्षेत्र : गुमला एवं छोटानागपुर
- समुदाय : उराँव (कुड़ुख) जनजाति
- स्वरूप : सामाजिक, धार्मिक एवं बाद में राजनीतिक आंदोलन
आंदोलन की पृष्ठभूमि
बिरसा आंदोलन के बाद भी आदिवासी समाज भूमि समस्या, करों, बेगार, सामाजिक कुरीतियों तथा औपनिवेशिक शोषण से जूझ रहा था। इसी परिस्थिति में उराँव समाज के भीतर आत्म-सुधार तथा स्वशासन की भावना विकसित हुई, जिसने ताना भगत आंदोलन का आधार तैयार किया।
प्रमुख उद्देश्य
- आदिवासी समाज में सामाजिक एवं धार्मिक सुधार लाना।
- एकेश्वरवाद तथा नैतिक जीवन का प्रचार करना।
- मांस, मदिरा एवं नशे का त्याग करना।
- झूम खेती की अपेक्षा व्यवस्थित कृषि को बढ़ावा देना।
- आदिवासी समाज में अनुशासन, स्वच्छता एवं समानता स्थापित करना।
- अंततः स्वशासन एवं अन्यायपूर्ण शासन का विरोध करना।
आंदोलन की प्रमुख विशेषताएँ
- यह आंदोलन प्रारम्भ में कुड़ुख धर्म आंदोलन के रूप में भी जाना गया।
- इसका संबंध मुख्यतः उराँव (कुड़ुख) जनजाति से था।
- जतरा भगत ने लोगों को एकेश्वरवाद, सादा जीवन एवं नैतिक आचरण अपनाने का संदेश दिया।
- उन्होंने मांस, मदिरा तथा अन्य नशीले पदार्थों के सेवन का विरोध किया।
- इस आंदोलन का मूल उद्देश्य समाज में आत्म-सुधार के माध्यम से नई चेतना का विकास करना था।
प्रसार में योगदान
ताना भगत आंदोलन के विस्तार में विभिन्न क्षेत्रों के अनेक स्थानीय नेताओं एवं अनुयायियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- मांडर – शिबू भगत
- घाघरा – बलराम भगत
- विशुनपुर – भिखू भगत
- सिसई – देवमनिया (महिला कार्यकर्ता)
जतरा भगत की गिरफ्तारी
ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए 1916 में जतरा भगत को गिरफ्तार कर एक वर्ष का कारावास दिया। बाद में उन्हें शांति बनाए रखने की शर्त पर रिहा किया गया, किंतु रिहाई के लगभग दो माह बाद ही उनका निधन हो गया। अनेक इतिहासकार उनकी मृत्यु का कारण जेल में मिली प्रताड़ना को मानते हैं।
महत्वपूर्ण तथ्य
- ताना भगत आंदोलन की शुरुआत 21 अप्रैल, 1914 को हुई।
- इस आंदोलन का नेतृत्व जतरा भगत ने किया।
- इसे बिरसा आंदोलन का वैचारिक विस्तार माना जाता है।
- प्रारम्भिक स्वरूप सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आंदोलन का था।
- मुख्य उद्देश्य स्वशासन, सामाजिक सुधार तथा नैतिक जीवन की स्थापना था।
- इस आंदोलन का प्रारम्भिक नाम कुड़ुख धर्म आंदोलन भी माना जाता है।
- 1916 में जतरा भगत को ब्रिटिश सरकार ने गिरफ्तार किया था।
ताना भगत आंदोलन (1914)
आंदोलन का विस्तार एवं विकास
जतरा भगत की गिरफ्तारी के बाद भी आंदोलन समाप्त नहीं हुआ। उनके अनुयायियों ने इसे आगे बढ़ाया और धीरे-धीरे इसका प्रभाव राँची, पलामू, गुमला, लोहरदगा तथा सरगुजा क्षेत्र तक फैल गया। प्रारम्भ में यह धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आंदोलन था, परन्तु समय के साथ इसका स्वरूप राजनीतिक एवं ब्रिटिश-विरोधी आंदोलन में परिवर्तित हो गया।
1916 के अंत तक आंदोलन छोटानागपुर के अनेक क्षेत्रों में फैल चुका था। ताना भगतों ने स्थानीय शासकों एवं अंग्रेजी प्रशासन के समक्ष भूमि कर समाप्त करने, स्वशासन की स्थापना तथा सामाजिक समानता की माँग रखी।
आंतरिक परिवर्तन
मांडर क्षेत्र में शिबू भगत द्वारा कुछ अनुयायियों को मांसाहार की अनुमति देने के कारण आंदोलन के भीतर मतभेद उत्पन्न हो गए। परिणामस्वरूप ताना भगत दो प्रमुख वर्गों में विभाजित हो गए।
- जुलाहा भगत — मांसाहार स्वीकार करने वाले अनुयायी।
- अरवा भगत — पूर्णतः शाकाहारी एवं मूल सिद्धांतों का पालन करने वाले अनुयायी।
राजनीतिक स्वरूप
समय के साथ ताना भगत आंदोलन केवल धार्मिक सुधार तक सीमित नहीं रहा। इसने अंग्रेजी शासन, अन्यायपूर्ण कर व्यवस्था तथा सामंती शोषण के विरुद्ध संगठित एवं अहिंसक संघर्ष का रूप धारण कर लिया।
ताना भगतों ने पलामू के राजा के समक्ष स्वशासन स्थापित करने, भूमि कर समाप्त करने तथा सामाजिक समानता लागू करने की माँग रखी। इन मांगों को अस्वीकार किए जाने के बाद आंदोलन और अधिक व्यापक हो गया।
1919 का चरण
1919 में छोटानागपुर क्षेत्र में ताना भगत आंदोलन से जुड़े अनेक नेताओं को गिरफ्तार किया गया, जिनमें प्रमुख थे—
- शिबू भगत
- देवीया भगत
- सिंह भगत
- माया भगत
- सुक्रा भगत
गिरफ्तारियों के बावजूद आंदोलन जारी रहा और ग्रामीण क्षेत्रों में इसका प्रभाव लगातार बढ़ता गया।
मालगुजारी एवं चौकीदारी कर का विरोध
दिसम्बर 1919 में तुरिया भगत एवं जीतू भगत ने लोगों से चौकीदारी कर तथा जमींदारों को मालगुजारी न देने का आह्वान किया। इससे आंदोलन का आर्थिक पक्ष भी मजबूत हुआ और यह औपनिवेशिक कर व्यवस्था के विरोध का प्रतीक बन गया।
अहिंसा का सिद्धांत
ताना भगत आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसका पूर्णतः अहिंसक स्वरूप था। आंदोलनकारियों ने सत्य, अनुशासन, संयम एवं शांतिपूर्ण विरोध को अपने संघर्ष का आधार बनाया। यही विशेषता आगे चलकर महात्मा गांधी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय आंदोलनों से इसके जुड़ने का प्रमुख कारण बनी।
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
- 1916 तक आंदोलन राँची, पलामू एवं सरगुजा क्षेत्र तक फैल गया था।
- शिबू भगत द्वारा मांसाहार स्वीकार करने पर आंदोलन दो भागों—जुलाहा भगत एवं अरवा भगत—में विभाजित हुआ।
- 1919 में अनेक प्रमुख ताना भगत नेताओं को गिरफ्तार किया गया।
- ताना भगतों ने भूमि कर एवं चौकीदारी कर का विरोध किया।
- यह झारखण्ड का प्रमुख अहिंसक आदिवासी आंदोलन माना जाता है।
ताना भगत आंदोलन (1914)
महात्मा गांधी एवं राष्ट्रीय आंदोलन से संबंध
ताना भगत आंदोलन अपने प्रारम्भिक चरण में धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आंदोलन था, लेकिन आगे चलकर यह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गया। इसके अनुयायियों ने महात्मा गांधी के सत्य, अहिंसा एवं असहयोग के सिद्धांतों को अपनाया और राष्ट्रीय आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी निभाई।
सविनय अवज्ञा आंदोलन तथा असहयोग आंदोलन के दौरान ताना भगतों ने शराब की दुकानों पर धरना, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार तथा शांतिपूर्ण सत्याग्रह जैसे कार्यक्रमों में भाग लिया। वे खादी पहनने, चरखा चलाने और स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग पर विशेष बल देते थे।
महात्मा गांधी से संबंध
- ताना भगत महात्मा गांधी के सिद्धांतों से अत्यधिक प्रभावित थे।
- उन्होंने खादी धारण करना एवं चरखा चलाना अपनाया।
- 1921 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में ताना भगतों ने सिद्धू भगत के नेतृत्व में भाग लिया।
- 1922 के गया कांग्रेस अधिवेशन तथा 1923 के नागपुर कांग्रेस अधिवेशन में भी ताना भगतों की भागीदारी रही।
- 1940 में रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन के दौरान ताना भगतों ने महात्मा गांधी को ₹400 की सहयोग राशि भेंट की।
आंदोलन की विशेषताएँ
- यह झारखण्ड का पहला प्रमुख अहिंसक आदिवासी आंदोलन माना जाता है।
- आंदोलन का आधार सत्य, अहिंसा, अनुशासन एवं सामाजिक समानता था।
- इसने धार्मिक सुधार से आगे बढ़कर राजनीतिक चेतना का विकास किया।
- आंदोलन ने आदिवासी समाज को राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
ऐतिहासिक महत्व
ताना भगत आंदोलन ने झारखण्ड के आदिवासी समाज में सामाजिक जागरूकता, नैतिक अनुशासन एवं राष्ट्रीय चेतना का विकास किया। यह आंदोलन ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अहिंसक संघर्ष का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। इसके माध्यम से आदिवासी समाज पहली बार बड़े स्तर पर भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ा और स्वतंत्रता संग्राम में अपनी सक्रिय भागीदारी दर्ज कराई।
Exam Booster (JSSC/JPSC)
- प्रारम्भ — 21 अप्रैल, 1914
- संस्थापक — जतरा भगत
- जनजाति — उराँव (कुड़ुख)
- प्रारम्भिक नाम — कुड़ुख धर्म आंदोलन
- मुख्य उद्देश्य — स्वशासन, सामाजिक सुधार एवं एकेश्वरवाद
- मुख्य विशेषता — झारखण्ड का प्रथम प्रमुख अहिंसक आदिवासी आंदोलन
- महात्मा गांधी के सिद्धांतों को अपनाने वाला प्रमुख आदिवासी आंदोलन।
- 1922 गया एवं 1923 नागपुर कांग्रेस अधिवेशन में भागीदारी।
- 1940 रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन में गांधीजी को ₹400 की भेंट।
- बिरसा आंदोलन के वैचारिक उत्तराधिकारी के रूप में माना जाता है।
एक नज़र में (Quick Revision)
| विषय |
तथ्य |
| वर्ष |
1914 |
| प्रमुख नेता |
जतरा भगत |
| मुख्य जनजाति |
उराँव (कुड़ुख) |
| स्वरूप |
धार्मिक → सामाजिक → राजनीतिक आंदोलन |
| मुख्य सिद्धांत |
सत्य, अहिंसा, एकेश्वरवाद, स्वशासन |
| गांधीजी से संबंध |
असहयोग, सविनय अवज्ञा, खादी एवं चरखा |
| विशेष पहचान |
झारखण्ड का प्रमुख अहिंसक आदिवासी आंदोलन |
MCQs – ताना भगत आंदोलन (1914)
1. ताना भगत आंदोलन का प्रारम्भ कब हुआ था?
- A. 1895 ई.
- B. 1908 ई.
- C. 21 अप्रैल, 1914
- D. 1920 ई.
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: C. 21 अप्रैल, 1914
व्याख्या: ताना भगत आंदोलन की शुरुआत 21 अप्रैल, 1914 को जतरा भगत के नेतृत्व में हुई थी।
2. ताना भगत आंदोलन के प्रवर्तक कौन थे?
- A. बिरसा मुंडा
- B. जतरा भगत
- C. सिद्धू मुर्मू
- D. लाल हेंब्रम
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: B. जतरा भगत
व्याख्या: ताना भगत आंदोलन का नेतृत्व उराँव जनजाति के जतरा भगत ने किया था।
3. ताना भगत आंदोलन मुख्यतः किस जनजाति से संबंधित था?
- A. मुंडा
- B. संथाल
- C. उराँव (कुड़ुख)
- D. हो
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: C. उराँव (कुड़ुख)
व्याख्या: यह आंदोलन मुख्य रूप से उराँव (कुड़ुख) जनजाति द्वारा संचालित किया गया था।
4. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए—
1. ताना भगत आंदोलन का प्रारम्भ धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आंदोलन के रूप में हुआ।
2. बाद में यह ब्रिटिश शासन के विरुद्ध राजनीतिक आंदोलन बन गया।
3. इसका प्रारम्भ संथाल परगना से हुआ था।
उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
- A. केवल 1 और 2
- B. केवल 2 और 3
- C. केवल 1 और 3
- D. 1, 2 और 3
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: A. केवल 1 और 2
व्याख्या: आंदोलन की शुरुआत गुमला क्षेत्र से हुई थी, संथाल परगना से नहीं।
5. ताना भगत आंदोलन का प्रारम्भिक नाम क्या था?
- A. बिरसाइट आंदोलन
- B. कुड़ुख धर्म आंदोलन
- C. मुल्की-मिल्की आंदोलन
- D. हूल आंदोलन
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: B. कुड़ुख धर्म आंदोलन
व्याख्या: प्रारम्भिक चरण में ताना भगत आंदोलन को कुड़ुख धर्म आंदोलन के नाम से भी जाना जाता था।
6. ताना भगत आंदोलन के संबंध में निम्नलिखित घटनाओं का सही कालानुक्रम क्या है?
- A. आंदोलन प्रारम्भ → जतरा भगत की गिरफ्तारी → असहयोग आंदोलन में भागीदारी → रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन
- B. जतरा भगत की गिरफ्तारी → आंदोलन प्रारम्भ → रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन → असहयोग आंदोलन
- C. असहयोग आंदोलन → आंदोलन प्रारम्भ → जतरा भगत की गिरफ्तारी → रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन
- D. आंदोलन प्रारम्भ → रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन → असहयोग आंदोलन → जतरा भगत की गिरफ्तारी
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: A. आंदोलन प्रारम्भ → जतरा भगत की गिरफ्तारी → असहयोग आंदोलन में भागीदारी → रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन
व्याख्या: 1914 → 1916 → 1920–22 → 1940 का क्रम सही है।
7. ताना भगत आंदोलन के अनुयायियों ने महात्मा गांधी से प्रेरित होकर क्या अपनाया?
- A. सशस्त्र संघर्ष
- B. विदेशी वस्तुओं का उपयोग
- C. खादी, चरखा एवं सत्याग्रह
- D. पृथक राज्य आंदोलन
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: C. खादी, चरखा एवं सत्याग्रह
व्याख्या: ताना भगतों ने महात्मा गांधी के सत्य, अहिंसा, स्वदेशी एवं खादी के सिद्धांतों को अपनाया।
8. कथन (A): ताना भगत आंदोलन झारखण्ड का प्रमुख अहिंसक आदिवासी आंदोलन था।
कारण (R): इसके अनुयायियों ने सत्य एवं अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए गांधीवादी विचारों को अपनाया।
- A. A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है।
- B. A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- C. A सही है, R गलत है।
- D. A गलत है, R सही है।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: A. A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है।
व्याख्या: ताना भगत आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता उसका पूर्णतः अहिंसक स्वरूप था।
9. 1940 के रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन में ताना भगतों ने महात्मा गांधी को कितनी राशि भेंट की थी?
- A. ₹100
- B. ₹250
- C. ₹400
- D. ₹500
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: C. ₹400
व्याख्या: 1940 के रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन में ताना भगतों ने महात्मा गांधी को ₹400 की सहयोग राशि भेंट की थी।
10. निम्नलिखित में से ताना भगत आंदोलन के संबंध में कौन-सा कथन सही है?
- A. यह केवल धार्मिक आंदोलन था।
- B. इसका नेतृत्व बिरसा मुंडा ने किया था।
- C. यह धार्मिक, सामाजिक एवं बाद में राजनीतिक आंदोलन के रूप में विकसित हुआ।
- D. इसका संबंध संथाल जनजाति से था।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: C. यह धार्मिक, सामाजिक एवं बाद में राजनीतिक आंदोलन के रूप में विकसित हुआ।
व्याख्या: ताना भगत आंदोलन की शुरुआत सामाजिक एवं धार्मिक सुधार से हुई, लेकिन आगे चलकर यह ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एक महत्वपूर्ण राजनीतिक एवं अहिंसक आंदोलन बन गया।